ॐ
गीता की कुछ शब्दावली - ९५
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु दानेषु यत् पुण्य फलं प्रदिष्टं .. अत्येति तत् सर्वं विदित्वा ... योगी परम् स्थानम् उपैति .. (अध्याय ८ - श्लोक २८)
வேதேஷு யக்ஞேஷு தபஹ்ஸு தானேஷு யத் புண்ய ஃபலம் ப்ரதிஷ்டம் ,,, அத்யேதி தத் ஸர்வம் விதித்வா யோகி பரம் ஸ்தானம் உபைதி ... (அத்யாயம் 8 - ஶ்லோகம் 28)
Vedheshu Yagnyeshu Tapassu Daaneshu Yat Punya Phalam Pradishtam ... Atyeti TatSarvam Viditvaa Yogi Param Sthaanam Upaiti ... (Chapter 8 - Shlokam 28)
अर्थ : वेद , यज्ञ , तपस , दान आदि पुण्य कर्मों से प्राप्त पुण्य फलों से अनाकृष्ट , योगी परम स्थान को प्राप्त करता है ।
वेद पुनीत हैं । परमात्मा का स्वर है । वेद पठन हमें श्री परमात्मा के साथ जोड़ देना चाहिए । वेद पठन में उस परम का स्पर्श की अनुभूति होनी चाहिए । "क्या ऐसा होता है ?" यह एक सत्कर्म है , या ब्राह्मण जन्म के नाते यह मेरे लिए एक कर्तव्य है , ऐसे विचार से वेदों को हम पढ़ते हैं । वेदों को पढ़ने से दैवी फल प्राप्ति होगी ऐसे सोचकर पढ़ने वाले भी हैं । क्या हमारी दृढ़ श्रद्धा है की वेद परमात्मा से प्रकट हैं । उसी का प्रकट स्वरुप है । क्या हम उसकी अनुभूति लेने की इच्छा रखकर पढ़ते हैं ?
गीता पंचम वेद का एक भाग है । भगवान के मुख से प्रकट हुई है । गीता के शब्द श्री कृष्ण के अमृत तुल्य अधरों को स्पर्श कर निकले हैं । श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं की , "गीता का अध्ययन जो करता है , गीता का श्रवण जो करता हो , गीता को मेरे भक्तों के बीच जो बोलता हो , वह मेरे लिए अति प्रिय है" । परन्तु , हम जब गीता का अध्ययन करते हैं , या सुनते हैं या गीता के विषय में बोलते हैं , क्या यह भावना हम में रहती है ? हम तो पुण्य प्राप्ति के लिए , स्वर्ग की प्राप्ति के लिए इस कर्म में लगे रहते हैं । पुण्य फल तो मिल जाएंगे । श्री कृष्ण की प्राप्ति नहीं होगी ।
कई प्रकार के यज्ञ किये जाते हैं । अनेकदा यज्ञ केवल कर्मकाण्ड रह जाता है , श्रद्धा विहीन । श्रद्धा के साथ किया जाए तो भी यज्ञ फल प्राप्ति के साथ जुड़ा ही होता है । यज्ञ से अपेक्षित फल स्वार्थी न होकर लोक क्षेम के लिए , सर्व भूत हिताय हो तो भी फलाकांक्षा तो है ही । फल तो निश्चित प्राप्त होंगे परन्तु परमात्मा नहीं ।
दान भी सत्कर्म है । पुण्य फलप्रदायी है । परन्तु यह दानी को अन्यों से अलग करता है । "मैं दान दे रहा हूँ । मेरे द्वारा इसका कष्ट मिट रहा है" यह अहम् भाव उभरता है । दान से इस लोक में उत्तम फल प्राप्त होते हैं और मरणोपरान्त अगले जीवन में पुण्य लोक प्राप्त होंगे , यह निश्चित है । परन्तु दान 'मैं' से बंधा होने के कारण परमात्मा प्राप्ति में असहायक है ।
एक संकल्प को लेकर , उसकी पूर्ती हेतु कठोर संयम ठानकर , मार्ग पर आने वाले सभी विरोध , अड़चन और कष्ट को सहकर , दृढ़ता से प्रयत्न करना तप है । तप से देवता संतुष्ट होकर , वर प्रदान कर दें तो आश्चर्य नहीं । परन्तु तप श्री परमात्मन के समीप पहुँचाने में असमर्थ है । क्यूँ की इससे संकल्प रुपी इच्छा जुडी है । और काल प्रवाह में , अधिक कठोर व्रत स्वीकार कर , अधिकाढ़ीक कष्ट सहने मानसिकता बनती है और जिस हेतु से तप किया जा रहा है उस संकल्प को पीछे छोड़ देती है । संयम जितना कठोर , कष्ट सहने की क्षमता जितनी अधिक , तप उतना ही श्रेष्ट माना जाने लगता है । कष्ट और दुःख के प्रति राग उत्पन्न हो जाता है । सुख की इच्छा यदि बंधक है और बाधक है , दुःख और कष्ट की इच्छा भी उतनी ही बंधक और बाधक है ।
श्री कृष्ण अर्जुन से पुनः पुनः कहते है की "योग युक्तो भव" ... "तस्माद योगी भव" .. "हे अर्जुन ! योगी बन जा" ... योगी इन सत्कर्मों से अपेक्षित फलों से आकृष्ट होता नहीं । वह परमात्मा के दिशा में प्रगत रहता है और उन्हें पाता है ।
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