ॐ
गीता की कुछ शब्दावली - ९६
न च मां तानी कर्माणि निबध्नन्ति ... (अध्याय ९ - श्लोक ९)
ந ச மாம் தானி கர்மாணி நிபத்னந்தி ... (அத்யாயம் 9 - ஶ்லோகம் 9)
Na Cha Maam Taani Karmaani Nibadhnanthi ... (Chapter 9 - Shlokam 9)
अर्थ : मुझे ये कर्म बांधते नहीं ।
श्री कृष्ण कह रहे हैं ... ये कर्म मुझे बान्धते नहीं । बंधा जाना क्या होता है ? बंधन हमें बांधकर , हमारे स्वतंत्र हालचाल , क्रियाशीलता को बाधित करता , हमारी प्रगति को थामता है ।
माना की कर्म बांधते हैं । क्या कर्म को त्यागकर , कर्महीन जीवन सम्भव है ? इह लौकिक जीवन में यह असम्भव ही है । इस शरीर , इन इन्द्रिय , मनस , बुद्धि जैसे प्राकृतिक देन जब तक साथ हैं , हम न चाहते हुए भी कर्म तो होंगे । इनका प्राकृतिक स्वभाव है । तो बांधने वाला क्या है ? कर्म के प्रति और कर्म से अपेक्षित फल के प्रति आसक्ति ही बांधती है । इच्छा बांधती है ।
कैसे ? "मैं इस कर्म को कर रहा हूँ" ; "इसे तो मैं ही करूँगा" । "मैं ही हूँ जो इसे करता हूँ" । "यदि मैं इसे नहीं करता तो ..."। ; "अन्यों ने भी प्रयत्न किया है , परन्तु ऐसा नहीं । यह पद्धति तो मैं ने अपने चिन्तन से खोज निकाली है" । ये सब कर्म के प्रति राग के उदाहरण हैं । यहाँ बांधने वाली रस्सी 'मैं" है ।
"यह कार्य मुझे अपार धन कमाकर देगा" । "इस कार्य से मेरा नाम और मेरी प्रसिद्धि उजागर होगी । मृत्यु के बाद मैं संसार में न रहकर भी चिरायु रहूँगा" । "इस में तो जन साधारण की भलाई है" । आदि आदि कर्म फल के प्रति आसक्ति के उदाहरण हैं । यहाँ भी 'मैं' भावना ही बांधती है ।
माना बंधे जाते हैं । उससे घाटा क्या है ? बाधा क्या है ?
सर्व प्रमुख बाधा - अज्ञान रूप स्तब्धता । "मैं रहूँगा । मेरा नाम अमर रहेगा" यह अज्ञान ... "मैं नहीं करूँ तो ... सर्वनाश" यह अज्ञान ... 'मैं भावना ही अज्ञान' हमारे आसपास कई उदाहरण इस सत्य को प्रकट करते हैं । परन्तु हम देखते नहीं । देखकर भी अनदेखा करते हैं । "उन पर जो बीता , मुझपर बीतेगा नहीं" ऐसा अपने आप को मोहित करवाता है अज्ञान ।
दूसरी बाधा - अहंकार रूप काँटा । यह अन्यों को चीर फाड़कर , अपने संसारी रिश्ते नाते ख़त्म कर , हमें अकेले खड़ा कर देता है । समत्व युक्त चिंतन शक्ति मिटा देता है । आध्यात्मिक प्रगति को बाधित करता है ।
तीसरी बाधा - हमें एक मिथ्याचारी , ढोंगी , नाटकी पात्र बना देता और अधोगति की ओर ढकेलता । नट क्या करता है ? सब को खुश करना चाहता है । नकली चेहरा दिखाता है । नकले शब्द बोलता है । अपने रसिकों को खोने के डर से सत्य बोलने से कतरता है । अपनी इच्छा के विरुद्ध भी कार्य और शब्द प्रयोग करता है । "कोई विकल्प नहीं" "इस क्षेत्र में यह तो चलता है" कहकर अपने आप को मना लेने का प्रयत्न करता है । नट केवल फ़िल्मी नट ही नहीं , हम में से कोई भी हो सकता है । फेसबुक जैसे स्थानों में लिखते तो लाइक की गिनती करते हैं । अधिक लाइक और फॉलोवर्स पाने लिखते हैं । सत्य ही लिखते ऐसा नहीं । मंच पर बोलने वाला तालियाँ गिनता है । और अधिक तालियों के लिए , वाह वाह के लिए बोलता है । सत्य ही बोलता ऐसा नहीं । फ़िल्मी नट रुपये गिनता है । अधिक रुपयों के लिए नौटंकी करता । अबद्ध , अभद्र बोलता । असत्य बोलना , अल्प सत्य को बढ़ा चढ़ाकर बोलना , अलंकृत भाषा बोलना आदि प्रधान हो जाते हैं ।
तो क्या करें ? अपने स्वभाव को पहचानकर , स्वभाव के अनुरूप बोल चाल , लेखन , कर्म ... बस यही एकमेव पर्याय है ।
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