ॐ
गीता की कुछ शब्दावली - ११०
बोधयन्तः परस्परम् ... (अध्याय १० - श्लोक ९)
போதயந்தஹ பரஸ்பரம் .. (அத்யாயம் 10 - ஶ்லோகம் 9)
Bodhayantah Parasparam ... (Chapter 10 - Shlokam 9)
अर्थ : परस्पर बोध करवाता है ।
अन्य किसी भी प्राणी को न देकर , केवल मनुष्य को श्री भगवान द्वारा प्रदत्त विशेष क्षमता है वाक् या वाणी । भाषा जानने वाला , भाषा न जानने वाला बच्चा , बोल न सकने वाला मूक व्यक्ति , बोलना जानता नहीं ऐसा पागल आदि सभी अपने कंठ से शब्द तो निकालते हैं , बहुत अधिक मात्रा में । यही वाक् है ऐसा कह भी लेते हैं । इनमे से अधिकांश शब्द शराब के नशे में शराबी के मुख से बाहर पड़ने वाले शब्द जैसे क्या और क्यूँ रहित हैं ।
वाक् अर्थपूर्ण होनी चाहिए । बोले जा रहे शब्द वाक् को अर्थपूर्ण नहीं बनाते । उन शब्द की हेतु ही वाक् को अर्थपूर्ण बनाता है ।
बोध याने स्व प्रज्ञा या होश । स्व प्रज्ञा ही आतंरिक प्रकाश है । भीतर प्रकाश हो , स्व प्रज्ञा हो तो बाहर पड़ने वाले शब्द स्पष्ट हेतु युक्त ही होंगे । शब्द ही नहीं , कर्म और चिन्तन भी हेतु पूर्ण ही होंगे । शब्द या चिन्तन या कर्म अर्थहीन और अनावश्यक नहीं होंगे ।
वाक् अर्थपूर्ण होनी चाहिए । बोले जा रहे शब्द वाक् को अर्थपूर्ण नहीं बनाते । उन शब्द की हेतु ही वाक् को अर्थपूर्ण बनाता है ।
बोध याने स्व प्रज्ञा या होश । स्व प्रज्ञा ही आतंरिक प्रकाश है । भीतर प्रकाश हो , स्व प्रज्ञा हो तो बाहर पड़ने वाले शब्द स्पष्ट हेतु युक्त ही होंगे । शब्द ही नहीं , कर्म और चिन्तन भी हेतु पूर्ण ही होंगे । शब्द या चिन्तन या कर्म अर्थहीन और अनावश्यक नहीं होंगे ।
बोधयन्तः परस्परं ... भक्त का विशेष लक्षण है यह । भक्त का वाक् अर्थपूर्ण , हेतु पूर्ण होता है । इसका वाक् अन्यों के अंतरात्मा को प्रकाशमान बनाता है । बोध जगाता है । स्व प्रज्ञा जगाता है ।
भक्त गण जब मिलते हैं तो परस्पर वार्ता में लीन होते हैं । आनंद से ओतप्रोत होते हैं ये वार्ता । परस्पर बोध जगाने वाले होते हैं ये वार्ता । यही श्री कृष्ण का कहना है ।
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