गीता की कुछ शब्दावली - १११
भजतां प्रीति पूर्वकम ... (अध्याय १० - श्लोक १०)
பஜதாம் ப்ரீதி பூர்வகம் ... (அத்யாயம் 10 - ஶ்லோகம் 10)
Bhajataam Preeti Poorvakam ... (Chapter 10 - Shlokam 10)
अर्थ : आनन्द में तल्लीन भजते हैं ।
आनन्द में मग्न होना , आनन्द में डूबना ... अपने आप को भूल , अपने आस पास की व्यक्ति और अन्य परिस्थिति से अनभिज्ञ हो तो आनन्द । उस स्थिति में रहते हुए , वर्तमान काल में , "मैं आनन्द का अनुभव कर रहा हूँ या मैं आनन्द में मग्न हूँ" ऐसा कहना असम्भव है । (उस स्थिति से बाहर निकलने के पश्चात , "कैसा अद्भुत आनन्द का अनुभव हुआ" ऐसा कहना सम्भव है ।) शुद्ध मानस वाला भाग्यशाली ही आनन्द मग्न हो सकता है । मन में अपेक्षायें पोषित करने वाला , मन में कूड़ा कचरा जमाने वाला , मन में इच्छाएं पालने वाला , आनन्दानुभव कर नहीं सकता है , वह चाहे कितना ही सामर्थ्य शाली और प्रतिभाशाली क्यों न हो ।
अपनी हिन्दू पारम्पर्य में प्रचार का स्थान गौण है । कला की विविध क्षेत्र में अद्भुत सृष्टि करने वाले , सहस्र वर्षों तक स्थिर रहने वाले सुन्दर मंदिरों को उभारने वाले , वेद उपनिषदों में ऋचाओं द्वारा अद्भुत ज्ञान को प्रकट करने वाले , विज्ञान के आश्चर्यमय रहस्यों का आविष्कार करने वाले और ऐसे ही अनेक क्षेत्रों में सृजन में सहभाग होने वाले अपने पूर्वज इन सृजन में स्वयं के नामों को जोड़ा नहीं । बस आनंद में डूबे । अद्भुत सृजन साढ़े गए । काल प्रवाह में जीवित रहने वाले सृजन उनसे सम्भव हुआ ।
प्रशंसा प्राप्त हो , अपना नाम लिया जानी चाहिए , जन समूह एकत्रित हो जाए , अनुचरों की संख्या में वृद्धि हो जाए , जय घोष लग जाए , अपने मत का समर्थन बढ़ जाए , जैसी इच्छाओं का जन्म होने से , सृजन से अधिक , 'मैं' पर ध्यान केंद्रित हो जाता है । 'मैं' को बढ़ाने की चेष्टा ही प्रमुख हो जाती है । कार्य में तल्लीन होना और आनन्दानुभव लुप्त हो जाते हैं ।
आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रचार के लिए लवलेश स्थान भी योग्य नहीं । अपने शास्त्रों के अनुसार , दैवी अनुभवों का अन्यों के साथ बांटना मना है । इस विषय में बोलना ही वर्जित है । इस क्षेत्र में प्रचार घुस आने से स्पर्धा , हिंसा , षड्यंत्र , ईर्ष्या , अन्यों को अपने मार्ग पर परिवर्तित करने की हेतु से कुटिल प्रयत्न , विरोध करने वालों को मिटा देने के हिंसक प्रयत्न आदि सहज हो जाते हैं । दैवी आनन्द में , परमानन्द में , परवश अवस्था में मग्न होने का अनुभव होते नहीं । ख्रिस्ती और मुसलमान समाज में पिछले कई शताब्दियों में एक भी महात्मा का जन्म हुआ नहीं । कारण ? इन मतावलम्बी , दैवी खोज से अधिक , दैवी आनन्द प्राप्त करने के प्रयत्न से अधिक , प्रचार में लगे । उसी प्रकार किसी महात्मा द्वारा बताया गया मार्ग पर चलने के लिए निर्मित संस्था या संगठन भी , अपार धन शक्ति के प्रयोग से जन सभाओं का आयोजन , हजारों लाखों में पर्ची बांटते हैं , पोस्टरों से कचरे का ढेर जमाते हैं , परन्तु उस महान विभूति के सामान और एक व्यक्ति उस संस्था या संगठन से उत्पन्न होता नहीं , यह कटु सत्य है ।
भक्त आनन्द में मग्न होता है । परमानन्द में डूबता है । उस तल्लीन अवस्था में भगवान को भजता है ।
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