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गीता की कुछ शब्दावली - १५२


गीता की कुछ शब्दावली - १५२


आवेश्य मनाः  ... (अध्याय १२ - श्लोक २)
ஆவேஶ்ய மனாஹ  ... (அத்யாயம் 12 - ஶ்லோகம் 2)
Aaveshya Manaah ...  (Chapter 12 - Shlokam 2)

अर्थ :  दृढ़ , स्थिर मनस ..

इस शब्दावली का प्रयोग श्री कृष्ण सगुण साकार भक्ति का वर्णन के सन्दर्भ में कर रहें हैं ।  "मुझ पर स्थिर स्थित मन" यह श्री कृष्ण के अनुसार सगुण साकार उपासना का प्रथम आवश्यकता है ।

'एक ही , दूसरा नहीं' इस में दृढ़ ।  'तुम ही , केवल तुम' इस में स्थिर ।  'तुम्हारी उपासना' में दृढ़ ।

हमारी दृढ़ता या स्थिरता की परिक्षा असामान्य परिस्थिति में होती है ।  आपद्काल में होती है ।  सामान्य काल में दृढ़ और स्थिर दिखने वाला मनस असामान्य परिस्थिति में लुढ़क जाता है ।  जीवन में आने वाले छोटे बड़े आंधी में उखड जाता है ।  हम वर्षों नित्य पूजा करने वाले ऐसे व्यक्ति जानते हैं जो अपने पुत्र की मृत्यु के कारण देव विग्रह को फ़ेंक देता है और उपासना छोड़ देता है ।  छोटे प्रलोभन में फंसता नहीं परन्तु बड़ा , अकल्पनीय राशि के प्रलोभन में पिघल जाने वाली 'नेक' व्यक्ति की दृढ़ता हमें परिचित होगा ।  जीवन के कष्टों को प्रसन्न मुख झेलने वाला व्यक्ति , कष्ट काल दीर्घ हो जाने पर अथवा कष्ट की कठोरता अधिक हो जाने पर लुढ़क जाता है ।

ऐसे कई कीर्तिमान , महान व्यक्ति हैं जिनकी मानसिक दृढ़ता असामान्य परिस्थिति में खो गयी और वे क्षण भर में या क्षण भर के लिए गिर गए ।  उनकी चर्चा करने में कोई प्रयोजन नहीं ।  हम ऐसे व्यक्तियों का स्मरण करेंगे जिनकी मानसिक दृढ़ता , स्थिरता सभी परिस्थितियों में अक्षुण्ण रही ।  मेरे स्मृति पटल में सर्व प्रथम उभरते हैं श्री गुरु गोबिन्द सिह्म ।  कितनी दृढ़ता ।  बालपन में पिता श्री तेग़ बहादुर का धड़ से अलग किया गया सर उनके सामने लाया गया ।  हिन्दू समाज की मानसिकता में परिवर्तन कर संगठित करने का कार्य अपने हाथ में लिया ।  एक ओर इस कार्य में मिलने वाले यश अपयश , दूसरी ओर औरंगजेब के अत्याचारी कुशासन के विरुद्ध सतत संघर्ष , पुत्र शोक , {एक नहीं चारों पुत्रों की मृत्यु , दो ज्येष्ठ पुत्र (१३ और १६ वर्ष की आयु) युद्ध में मरे और मुसलमान बनाने के कठोर प्रयत्न में अन्य दो कनिष्ठ पुत्र (मात्र १० वर्ष और ७ वर्ष की आयु) चूना की दीवार में जीवित गाढ़े गए} , स्वजनों का विद्रोह जैसे कई प्रकार के कष्ट ।  सभी परिस्थितियों में उनका मन दृढ़ रहा ।  स्थिर रहा ।  वाहे गुरु !

युवावस्था में जिज्ञासु मन में संदेह और प्रश्न लेकर निवारण के लिए व्यक्तियों के पीछे भटकते समय , जीवन के अंतिम काल में रोग ग्रस्त शरीर के साथ हिमाचल में आश्रय लेते समय , परिवार और प्रियजन उधार के भोज में पिसे जाते समय , पश्चिम देशों के यशस्वी दौरे समाप्त कर श्री रामकृष्ण मठ की स्थापना हेतु बड़ी धन राशि एकत्रित कर लौटते समय , परिव्राजक जीवन काल में बेनाम अनजान रहकर भारत भ्रमण करते समय , अमेरिका में सर्व सम्प्रदाय समागम में प्रवचन के पश्चात अत्याधिक कीर्ति कमा कर , प्रचंड जन समुदाय द्वारा भारत में स्वागत होते समय , परिव्राजक जीवन काल में भारत में और सर्व सम्प्रदाय समागम के पूर्व अमेरिका में भोजन के विना , विश्राम के लिए योग्य स्थान के विना बिताये दिनों में , सर्व सम्प्रदाय समागम के पश्चात अमेरिका में धनवानों के , प्रतिष्ठित नागरिकों के घरों में अतिथी बनकर रहते समय , भारत में राजा महाराजाओं द्वारा स्वागत सम्मान किया जाते समय , ऐसे कई परिस्थितियों में अडिग रहा स्वामी विवेकानन्द का मनस ।

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