ॐ
गीता की कुछ शब्दावली - २२०
अपरस्पर सम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् .. (अध्याय १६ - श्लोक ८)
அபரஸ்பர ஸம்பூதம் கிமன்யத் காம ஹைதுகம் .. (அத்யாயம் 16 - ஶ்லோகம் 8)
Aparaspara Sambhootam Kimanyat Kaama Haitukam .. (Chapter 16 - Shlokam 8)अर्थ : यह जगत केवल स्त्री पुरुष संयोग से बना है । इस का हेतु काम / इच्छा तुष्टि के अलावा और कुछ नहीं ।
असुर की दृष्टी को काम दृष्टी कहा तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । सर्वदा काम , सर्वथा काम .. सर्वत्र काम .. आँखें जिसे देख नहीं सकते , उसे असुर मानता नहीं । तो यह स्वाभाविक है वह सृष्टि को केवल काम पूर्ण चेष्टा का ही फल माने । शरीरों के मेल से , केवल सम्भोग से ही जीव उत्पत्ति होते हैं , उसका यह विशवास है । असत्य । यह सत्य हो तो प्रत्येक मिलन से शिशु की उत्पत्ति होनी चाहिए । परन्तु ऐसे कई दम्पति हैं , अन्य सभी विषय ठीक होते हुए भी जिन्हें बच्चा मिलता नहीं । और ऐसे भी हैं जिन्हें बस एक ही प्रयत्न में पुत्र भाग्य का लाभ हो जाता है । अतः यह स्पष्ट है की शारीरिक मिलन से ऊपर अन्य कई , सस्थूल और सूक्ष्म , बातें हैं , शिशु की सृष्टि में ।
हाइड्रोजन का एक अणु और आक्सीजन का एक अणु के मिलान से जल का एक अणु ही बनना है । और जल के सभी अणु में समानता है , बाह्य , आतंरिक और गुणात्मक । कार्बन को यदि जलाओ तो कार्बन - डै - आक्साइड ही बनना है । आक्सीजन कम हो तो कार्बन - मोनो - आक्साइड बनेगा । पदार्थों के मिलान की यही विधि है । केवल सेल के मेल से , पुरुष सेल और स्त्री सेल के मेल से बच्चा होता है तो , सभी बच्चे समान होने चाहिये । कितने कितने प्रकार के अन्तर और विविधता के साथ बच्चे जन्मते हैं !! एक ही माँ बाप के सभी बच्चे समान नहीं होते । दिखने में यदि साम्यता हो तो भी , गुणों में , क्षमता में , दृष्टिकोण में , रुचियों में , बुद्धि की प्रखरता में , कलाओं की निपुणता में , चातुर्यता में , व्यवहार में .. ओ हो !! कितने प्रकार के अन्तर । और ये असमानता छोटी नहीं । यही सत्य है । परन्तु प्रचण्ड 'मैं' को धारण किया हुआ असुर , 'मुझसे सब कुछ सम्भव है' यह फूंका हुआ मद को पहना हुआ असुर , 'मेरे अलावा कोई नहीं , मुझसे बढ़कर कोई नहीं ' इस अंधकार को स्वीकारा हुआ असुर , को यह सत्य दिखता नहीं । 'बस ! केवल काम है' , उसका यह कहना स्वाभाविक है ।
इन असुरों के लिए जीवन का हेतु ही काम है , काम की पूर्ती है । आसुरी वृत्ति को स्पष्ट दर्शाने वाले उदाहरण समीप काल में 'भगवान है नहीं' का नारा लगाने वाले द्राविड़ कळगम के नेता गण । एक नेता जो गांव गांव में महिलाएं 'रखा' , एक नेता जो अपनी नातिन के साथ पढ़ने वाली लड़की के साथ जोर जबरदस्ती कर विवाह किया, एक युवा नेता जो महिला कॉलेजों से लड़कियाँ उठा लाकर काम पूर्ती करता था , एक नेता जो अपने सत्तर वर्ष की आयु में , शरीर में मूत्र पात्र लगाई हुई अवस्था में तीस वर्ष के महिला से विवाह रचाया , एक नेता जो नट था और अनैतिक सम्बन्धों के लिए कुप्रसिद्ध था , किसी और की पत्नी को भगा ले आकर अपना जीवन का आरम्भ किया , एक महिला नेता जो नटी थी जिसके अनेक अनैतिक सम्बन्ध प्रसिद्द थे .. प्रसिद्द कवी श्री कन्नदास जिसने इनके साथ कई वर्ष बिताया , इन सभी के काम लीलाओं का विस्तृत वर्णन अपने वनवास पुस्तक में किया है ।
ऐसे नेता गण के प्रभाव से .. कुप्रभाव से आज का सिनिमा , साप्ताहिक पत्रिकाएं , टीवी , कविताये , विज्ञापन आदि सभी काम पूर्ण हैं । काम ही प्रधान है । ऐसा दृश्य है मानो जीवन का हेतु काम पूर्ती के अलावा और कुछ नहीं ।
हाइड्रोजन का एक अणु और आक्सीजन का एक अणु के मिलान से जल का एक अणु ही बनना है । और जल के सभी अणु में समानता है , बाह्य , आतंरिक और गुणात्मक । कार्बन को यदि जलाओ तो कार्बन - डै - आक्साइड ही बनना है । आक्सीजन कम हो तो कार्बन - मोनो - आक्साइड बनेगा । पदार्थों के मिलान की यही विधि है । केवल सेल के मेल से , पुरुष सेल और स्त्री सेल के मेल से बच्चा होता है तो , सभी बच्चे समान होने चाहिये । कितने कितने प्रकार के अन्तर और विविधता के साथ बच्चे जन्मते हैं !! एक ही माँ बाप के सभी बच्चे समान नहीं होते । दिखने में यदि साम्यता हो तो भी , गुणों में , क्षमता में , दृष्टिकोण में , रुचियों में , बुद्धि की प्रखरता में , कलाओं की निपुणता में , चातुर्यता में , व्यवहार में .. ओ हो !! कितने प्रकार के अन्तर । और ये असमानता छोटी नहीं । यही सत्य है । परन्तु प्रचण्ड 'मैं' को धारण किया हुआ असुर , 'मुझसे सब कुछ सम्भव है' यह फूंका हुआ मद को पहना हुआ असुर , 'मेरे अलावा कोई नहीं , मुझसे बढ़कर कोई नहीं ' इस अंधकार को स्वीकारा हुआ असुर , को यह सत्य दिखता नहीं । 'बस ! केवल काम है' , उसका यह कहना स्वाभाविक है ।
इन असुरों के लिए जीवन का हेतु ही काम है , काम की पूर्ती है । आसुरी वृत्ति को स्पष्ट दर्शाने वाले उदाहरण समीप काल में 'भगवान है नहीं' का नारा लगाने वाले द्राविड़ कळगम के नेता गण । एक नेता जो गांव गांव में महिलाएं 'रखा' , एक नेता जो अपनी नातिन के साथ पढ़ने वाली लड़की के साथ जोर जबरदस्ती कर विवाह किया, एक युवा नेता जो महिला कॉलेजों से लड़कियाँ उठा लाकर काम पूर्ती करता था , एक नेता जो अपने सत्तर वर्ष की आयु में , शरीर में मूत्र पात्र लगाई हुई अवस्था में तीस वर्ष के महिला से विवाह रचाया , एक नेता जो नट था और अनैतिक सम्बन्धों के लिए कुप्रसिद्ध था , किसी और की पत्नी को भगा ले आकर अपना जीवन का आरम्भ किया , एक महिला नेता जो नटी थी जिसके अनेक अनैतिक सम्बन्ध प्रसिद्द थे .. प्रसिद्द कवी श्री कन्नदास जिसने इनके साथ कई वर्ष बिताया , इन सभी के काम लीलाओं का विस्तृत वर्णन अपने वनवास पुस्तक में किया है ।
ऐसे नेता गण के प्रभाव से .. कुप्रभाव से आज का सिनिमा , साप्ताहिक पत्रिकाएं , टीवी , कविताये , विज्ञापन आदि सभी काम पूर्ण हैं । काम ही प्रधान है । ऐसा दृश्य है मानो जीवन का हेतु काम पूर्ती के अलावा और कुछ नहीं ।
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