ॐ
गीता की कुछ शब्दावली - २३२
यो यच्छ्रद्धः स एव सः .. (अध्याय १७ - श्लोक २)
யோ யச்ச்ரத்தஹ ஸ ஏவ ஸஹ .. (அத்யாயம் 17 - ஶ்லோகம் 2)
Yo Yatchchraddhah Sa Eva Sah .. (Chapter 17 - Shlokam 2)
अर्थ : जिसकी जैसी श्रद्धा है , वही है वह ।
As you think , so you become .. यह आङ्ग्ल भाषा में एक वचन है । अपने चिन्तन के अनुसार हम ढलते हैं यह इस वचन अर्थ हुआ । यह ऊपरी ऊपर का सोच हुआ । पश्चिम के विचारकों का श्रद्धा नामक गहराई तक पहुँचने में अक्षम होने का परिणाम है यह वचन । जो जो सोचते हैं , वह परिणमित होता नहीं । हमारे मन में उभरने वाली प्रत्येक कल्पना सत्य में परिवर्तित होती नहीं ।
अन्य सभी विषयों जैसे इस विषय में भी हिन्दू आङ्ग्ल अमेरिकी समाज से अनेक कदम आगे हैं । हमारा विचार की घोषणा यह है की शिवो भूत्वा शिवम् यजेत् । शिव जी की उपासना करने वाला शिवजी ही बन जाता है । केवल पुष्प और मंत्रों से पूजा नहीं , श्रद्धा पूर्ण उपासना । यहाँ गीता में श्री कृष्ण की घोषणा यह है की मनुष्य श्रद्धा मय है । जिसकी जितनी श्रद्धा , वह भी उतना ही है । श्रद्धा यह केवल सोच नहीं । चिन्तन नहीं । आङ्ग्ल भाषा श्रद्धा के लिए समानार्थी शब्द है नहीं । Conviction , Faith जैसे शब्द अर्थ के निकट पहुँचते है , परन्तु पर्याप्त नहीं । भारत देश की अन्य भाषाओं में भी श्रद्धा के लिए समानार्थी शब्द नहीं । सभी भाषाओं में इसी शब्द का प्रयोग है ।
विश्वास अलग है । श्रद्धा अलग है । सोच , चिन्तन , स्वप्न दर्शन , कल्पना आदि सभी श्रद्धा से भिन्न हैं । डॉ अब्दुल कलाम कहते थे की स्वप्ना देखो । अन्य किसी सन्दर्भ में भले सत्य हो , परन्तु स्वप्ना सत्य होते नहीं । हमारी प्रत्येक सोच का सत्य रूपांतर होता नहीं । जो विश्वास है उन सभी की पूर्ती होती नहीं । "मैं ऐसा बनूंगा" ; "मुझे ऐसा बनना है" ; "मुझे यह प्राप्त करना है" ; "यह मेरे लिए अवश्य लभित होगा" आदि आदि विश्वास है , सोच है , चिन्तन है , स्वप्ना है , कल्पना है , श्रद्धा नहीं । "मैं" सम्बंधित श्रद्धा हो नहीं सकती । श्रद्धा केवल जीवन मूल्यों की हो सकती है । "सत्यमेव जयते - सत्य का ही निश्चित विजय होगा" यह श्रद्धा है । "ईमानदार परिश्रम फल निश्चित है" यह श्रद्धा है । "सुहृद बनना , सबकी भलाई की कामना करना" श्रद्धा का विषय है । "भलाई से भलाई ही उपजती है" यह श्रद्धा है । "संसार में , भला या बुरा , सभी की पुनरावृत्ति निश्चित है । भला या बुरा , सुख या दुःख , हर्ष या शोक , कुछ भी अनन्त काल तक रहता नहीं । काल प्रवाह में सब कुछ बदलता ही है" यह श्रद्धा है । "अपने मन की गहराई में जो भावना सुप्त अवस्था में है , उसी के अनुरूप हमें , मित्र , बंधू , पत्नी , बच्चे , यजमान , नौकर , पद , अवसर आदि सब कुछ प्राप्त होते हैं" यह श्रद्धा है ।
ऐसी श्रद्धायें जिस प्रमाण में हो उसी प्रमाण में वह मनुष्य भी है । श्रद्धा जितनी हो बस उतनी ही वह व्यक्तित्त्व भी है । श्रद्धा जैसी हो , बस वैसा ही उसका व्यक्तिमत्त्व भी है । यही कहना है श्री कृष्ण का ।
As you think , so you become .. यह आङ्ग्ल भाषा में एक वचन है । अपने चिन्तन के अनुसार हम ढलते हैं यह इस वचन अर्थ हुआ । यह ऊपरी ऊपर का सोच हुआ । पश्चिम के विचारकों का श्रद्धा नामक गहराई तक पहुँचने में अक्षम होने का परिणाम है यह वचन । जो जो सोचते हैं , वह परिणमित होता नहीं । हमारे मन में उभरने वाली प्रत्येक कल्पना सत्य में परिवर्तित होती नहीं ।
अन्य सभी विषयों जैसे इस विषय में भी हिन्दू आङ्ग्ल अमेरिकी समाज से अनेक कदम आगे हैं । हमारा विचार की घोषणा यह है की शिवो भूत्वा शिवम् यजेत् । शिव जी की उपासना करने वाला शिवजी ही बन जाता है । केवल पुष्प और मंत्रों से पूजा नहीं , श्रद्धा पूर्ण उपासना । यहाँ गीता में श्री कृष्ण की घोषणा यह है की मनुष्य श्रद्धा मय है । जिसकी जितनी श्रद्धा , वह भी उतना ही है । श्रद्धा यह केवल सोच नहीं । चिन्तन नहीं । आङ्ग्ल भाषा श्रद्धा के लिए समानार्थी शब्द है नहीं । Conviction , Faith जैसे शब्द अर्थ के निकट पहुँचते है , परन्तु पर्याप्त नहीं । भारत देश की अन्य भाषाओं में भी श्रद्धा के लिए समानार्थी शब्द नहीं । सभी भाषाओं में इसी शब्द का प्रयोग है ।
विश्वास अलग है । श्रद्धा अलग है । सोच , चिन्तन , स्वप्न दर्शन , कल्पना आदि सभी श्रद्धा से भिन्न हैं । डॉ अब्दुल कलाम कहते थे की स्वप्ना देखो । अन्य किसी सन्दर्भ में भले सत्य हो , परन्तु स्वप्ना सत्य होते नहीं । हमारी प्रत्येक सोच का सत्य रूपांतर होता नहीं । जो विश्वास है उन सभी की पूर्ती होती नहीं । "मैं ऐसा बनूंगा" ; "मुझे ऐसा बनना है" ; "मुझे यह प्राप्त करना है" ; "यह मेरे लिए अवश्य लभित होगा" आदि आदि विश्वास है , सोच है , चिन्तन है , स्वप्ना है , कल्पना है , श्रद्धा नहीं । "मैं" सम्बंधित श्रद्धा हो नहीं सकती । श्रद्धा केवल जीवन मूल्यों की हो सकती है । "सत्यमेव जयते - सत्य का ही निश्चित विजय होगा" यह श्रद्धा है । "ईमानदार परिश्रम फल निश्चित है" यह श्रद्धा है । "सुहृद बनना , सबकी भलाई की कामना करना" श्रद्धा का विषय है । "भलाई से भलाई ही उपजती है" यह श्रद्धा है । "संसार में , भला या बुरा , सभी की पुनरावृत्ति निश्चित है । भला या बुरा , सुख या दुःख , हर्ष या शोक , कुछ भी अनन्त काल तक रहता नहीं । काल प्रवाह में सब कुछ बदलता ही है" यह श्रद्धा है । "अपने मन की गहराई में जो भावना सुप्त अवस्था में है , उसी के अनुरूप हमें , मित्र , बंधू , पत्नी , बच्चे , यजमान , नौकर , पद , अवसर आदि सब कुछ प्राप्त होते हैं" यह श्रद्धा है ।
ऐसी श्रद्धायें जिस प्रमाण में हो उसी प्रमाण में वह मनुष्य भी है । श्रद्धा जितनी हो बस उतनी ही वह व्यक्तित्त्व भी है । श्रद्धा जैसी हो , बस वैसा ही उसका व्यक्तिमत्त्व भी है । यही कहना है श्री कृष्ण का ।
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