ॐ गीता की कुछ शब्दावली - ११२ सर्वमेतद ऋतं मन्ये यत् वदसि ... (अध्याय १० - श्लोक १४) ஸர்வமேதத் ர்தம் மன்யே யத் வதஸி .. (அத்யாயம் 10 - ஶ்லோகம் 14) Sarvametad Rtam manye yat vadasi ... (Chapter 10 - Shlokam 14) अर्थ : आप जो कहते हो , सर्व सत्य मानता हूँ । अर्जुन नर है । एक साधारण मनुष्य । उसके मुख से निकली यह शब्दावली में , हमारे आस पास विचरते कई मनुष्यों में दिखने वाली एक दृष्टी प्रकट हो रही है । धन संपत्ति से , विद्या से , पद अधिकार से , या कीर्ति से बड़ा माना जाने वाला व्यक्ति कुछ कहता है तो वह बड़ा है केवल इसी लिए , उसकी कथनी सत्य मानी जाती है । यह साधारण मनुष्यों में सहज वृत्ति है । आपसी बातचीत में जब अपना वाद बलहीन होता दीखता है , तो "चाणक्य ने भी कहा है " या "नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कहा है" या "अमेरिका में ऐसी ही मान्यता है" ऐसा कहकर , किसी शक्तिशाली व्यक्ति को खींच लाकर सामने वाले का मुँह बंद करने का प्रयत्न हमने अनेक बार देखा है । यहाँ तो श्री कृष्ण अर्जुन का परम मित्र है । र...
राम गोपाल रत्नम्